माँ बगलामुखी दस महाविद्याओं में एक महत्वपूर्ण महाविद्या मानी जाती हैं। उन्हें स्तंभन-शक्ति, वाक्-शक्ति तथा शत्रुता और बाधक प्रवृत्तियों को नियंत्रित करने वाली देवी के रूप में वर्णित किया जाता है। बगलामुखी का स्वरूप पीतवर्ण से संबंधित होने के कारण उन्हें ‘पीताम्बरा’ भी कहा जाता है।
बगलामुखी यंत्र देवी की शक्ति का ज्यामितीय प्रतीक है। तांत्रिक परंपरा में यंत्र को साधना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यंत्र के विभिन्न भाग देवी के शक्ति-तत्त्वों का प्रतीकात्मक निरूपण करते हैं। परंपरा के अनुसार इसकी संरचना में भिन्नता मिल सकती है।
बगलामुखी उपासना का प्रमुख भाव वाणी और चित्त पर नियंत्रण, विरोधी परिस्थितियों का शमन, भय से मुक्ति तथा न्यायपूर्ण उद्देश्य की रक्षा से संबंधित है। ‘स्तंभन’ का अर्थ प्रत्येक स्थिति में किसी व्यक्ति को हानि पहुँचाना नहीं समझना चाहिए। आध्यात्मिक दृष्टि से इसे नकारात्मक प्रवृत्तियों, अनुचित वाणी और बाधक परिस्थितियों को रोकने की शक्ति के रूप में भी समझा जाता है।
बगलामुखी यंत्र की स्थापना सामान्यतः पीले वस्त्र पर की जाती है। पीले पुष्प, हल्दी, अक्षत, दीप और धूप से पूजन किया जाता है। देवी के पीतवर्ण स्वरूप का ध्यान करते हुए साधक अपने मन, वाणी और कर्म को संयमित रखने का संकल्प करता है।
बगलामुखी साधना के अनेक मंत्र तांत्रिक परंपराओं में प्रचलित हैं। सामान्य रूप से देवी का ध्यान और नाम-स्मरण किया जा सकता है, लेकिन विशिष्ट मूलमंत्र, पुरश्चरण, अनुष्ठान एवं प्रयोग गुरु-दीक्षा के बिना नहीं किए जाने चाहिए।
बगलामुखी साधना का अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष वाणी की शुद्धता है। देवी को वाक्-शक्ति से जोड़कर देखा जाता है, इसलिए साधक को असत्य, अपशब्द, अनावश्यक विवाद और किसी के अहित की भावना से बचने का प्रयास करना चाहिए।
बगलामुखी यंत्र को किसी पर अनुचित नियंत्रण अथवा हानि पहुँचाने का साधन समझना साधना की मूल भावना के विपरीत है। इसका श्रेष्ठ उपयोग आत्मसंयम, नकारात्मक परिस्थितियों के शमन और धर्मसम्मत उद्देश्य की रक्षा के भाव से किया जाना चाहिए।