कनकधारा यंत्र का संबंध देवी महालक्ष्मी की उस कृपा-शक्ति से माना जाता है जो धन, ऐश्वर्य, समृद्धि और आर्थिक स्थिरता का प्रतीक है। ‘कनकधारा’ का अर्थ स्वर्ण की धारा अथवा समृद्धि की अविरल धारा से संबंधित माना जाता है। कनकधारा स्तोत्र की परंपरा आदि शंकराचार्य से जुड़ी हुई है और लक्ष्मी-कृपा की प्रार्थना के रूप में इसका विशेष महत्व है।
कनकधारा यंत्र को लक्ष्मी तत्त्व का ध्यानात्मक एवं प्रतीकात्मक आधार माना जाता है। यंत्र में प्रयुक्त ज्यामितीय आकृतियाँ और मंत्रात्मक चिह्न ऊर्जा के विभिन्न स्तरों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यंत्र की रचना परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकती है, इसलिए किसी प्रमाणित परंपरा में प्रचलित यंत्र का ही उपयोग करना उचित है।
कनकधारा यंत्र की उपासना धन की प्राप्ति के साथ-साथ आर्थिक स्थिरता, व्यापारिक उन्नति, परिवार में सुख-समृद्धि तथा अभाव की भावना को दूर करने के उद्देश्य से की जाती है। लक्ष्मी उपासना में केवल धन प्राप्ति ही लक्ष्य नहीं माना जाता, बल्कि धन के सदुपयोग, संतोष, दान और धर्मसम्मत जीवन को भी महत्व दिया जाता है।
यंत्र की स्थापना स्वच्छ पूजा-स्थान में शुक्रवार या किसी शुभ अवसर पर की जा सकती है। लाल अथवा पीले वस्त्र पर यंत्र स्थापित करके दीप, धूप, पुष्प, अक्षत और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। श्रीसूक्त, कनकधारा स्तोत्र अथवा लक्ष्मी संबंधी मंत्रों का पाठ किया जा सकता है।
सामान्य उपासना में “ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः” मंत्र का जाप किया जाता है। कनकधारा स्तोत्र का नियमित पाठ भी लक्ष्मी उपासना की महत्वपूर्ण परंपरा है।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि यंत्र अपने आप में धन का कोई यांत्रिक या निश्चित स्रोत नहीं है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में इसे साधक की श्रद्धा, ध्यान और उपासना को केंद्रित करने वाला माध्यम माना जाता है। धन की प्राप्ति के साथ उचित कर्म, परिश्रम, विवेक और धर्मसम्मत आचरण को भी समान महत्व दिया गया है।
कनकधारा यंत्र का आध्यात्मिक संदेश है कि समृद्धि तभी सार्थक है जब उसका उपयोग परिवार, समाज और धर्मसम्मत कार्यों में किया जाए। इसलिए इसकी साधना में लक्ष्मी के साथ सद्बुद्धि, संतोष और सेवा-भाव की प्रार्थना करना श्रेष्ठ माना जाता है।